मोक्ष दो प्रभु मुझे मोक्ष दो
जीते जीते थक गई हूँ
मृत्यु वरण को आतुर हूँ
अपने चरणों का सामीप्य दो
मोक्ष दो प्रभु मुझे मोक्ष दो
जिंदगी की वीरान छाया
मुख-मंडल पर बिखरी है
मृत्यु की स्वागतोन्मुख आंखों में
बस थोडी चमक शोभित है
मुझे जिंदगी से द्वेष है पर जीवन मुझ पर मोहित है
इस जीवन से मुक्ति दो
मोक्ष दो प्रभु मुझे मोक्ष दो
ब्रह्मांड के इस अनजान स्थल पर
कैसे मैं पहुँच गई
क्योंकर मैं जीती जागती कठपुतली
बन नृत्य करने लगी
ब्रह्मा के इस श्राप से मुक्ति प्रदान करो
मृत्यु का वर मुझको दो
मोक्ष दो प्रभु मुझे मोक्ष दो
हृदय विदारक चीखों से
गूँज उठा है आसमान
दिल के JHANJHAAVATON से
हिल उठी dha ra mahaan
कोई राह नहीं SHESH अब
मृत्यु का मुझे DAAN दो
मोक्ष दो प्रभु मुझे मोक्ष दो
Wednesday, 3 September 2008
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1 comment:
apaki kavita padi, 'mokhya do, mujhe moksh do..'' pad kar laga jaise aapane to mere dil ki bat wayakta kar di hai,
pariji, kavita ke anusar aap jis manosthaiti me chala rahi hai, vahi meri bhi chal rhi hai.
apako bhahott-bhahoot dhanyawad, 'aap-hum' ko follow karane ke liyen.
pankaj vyas, ratlam
www.aap-hum.blogspot.com
thanas again.
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