Monday, 19 January 2009

ख्वाबगाह , मेरे ख़्वाबों का बागबाँ
सजदा करती हूँ mai जहाँ
मेरे ख्वाब, लड़ी में पिरोए हुए
उड़ते फिरते हैं यहाँ -वहाँ

यहाँ के दरख्तों पर मोहब्बत आराम फरमाती है
खुले दरवाजों से दबे पाँव आकर खुशियाँ यहीं बस जाती हैं

खिड़कियों में हँसी के शोशे, नौश फरमाते हैं
कहकहे आगोश में समाने को बेताब हुए जाते हैं

तन्हाई भी यहाँ आकर सरगोशियाँ करने लगती हैं
दीवारें भी यहाँ की मखमली मदहोशी बुना करती हैं

ख्वाबगाह, मेरी मोहब्बतों की इन्तिहाँ
सेहरा के हर अश्क के लिए एक मक्मूल आसरा
नीली roshnaaion में bune they जो ख्वाब
अमल हुए हैं vo आकर यहाँ......