Sunday, 31 August 2008

SOMA

मेरी नीरस और अकेलेपन से ग्रस्त ज़िन्दगी में मशीनों के अलावा दो इंसान भी शामिल हैं। दिन में कुछ पल होते हैं जब मैं इंसानों के बीच होती हूँ अन्यथा दिन भर तो इन मशीनों के साथ कवायद में निकल जाता है.वो बेचारी भी क्या करें मेरा मन लगाने की नाकाम कोशिशें करती रहती हैं.इन मशीनों में सबसे ऊपर मेरे लैपटॉप का नाम आता है.मेरे अकेलेपन का साथी,बाहर की दुनिया से सम्बन्ध स्थापित करने का एकमात्र जरिया। ऐसा नहीं है की मुझे उस से प्यार नहीं है..है बहुत प्यार है.पर फिर भी, है तो वो एक मशीन ही और मै जीती जागती प्राणी.अंत में मुझे भी किसी न किसी प्राणी की आवश्यकता आन ही पड़ती है पर मै भी पता नहीं किस मिटटी से गढ़ी हूँ इतने अकेलेपन के बावजूद न जाने क्यों किसी से मित्रता नहीं कर पाती.खैरये सब बातें फिर कभी आज आपको बताती हूँ उनके बारे में जो मेरे मरुभूमि से जीवन में शीतल जल का बादल बन कर आते हैं।
पहले तो हैं मेरे पति.उनके बारे में फिर कभी.आज तो मेरा लेख समर्पित है सोमा को। सोमा ...मेरी मेड है.सुबह ७ बजे आती है और सारे काम कर के ११ बजे तक चली भी जाती है.उन ४ घंटो में बमुश्किल ही मेरा उससे कोई संवाद होता होगा,काम की बात को छोड़कर.उसकी भी अब तो ज़रुरत नहीं पड़ती इतनी एक्सपर्ट जो हो गयी इन ४ महीनो में। पर फिर भी संवाद रहित ही सही एक रिश्ता कायम हो गया है हम दोनों के बीच। कम से कम मुझे तो ऐसा ही प्रतीत होता है। उसके आने से मेरे दिन की शुरुआत होती है मतलब की उसके घंटी बजाने के बाद ही मैं उठती हूँ और अपनी दिनचर्या शुरू करती हूँ और वो अपने काम में लग जाती है.और फिर वो अपना काम ख़तम करके चली जाती है.बस इतना ही....पर क्या वाकई में इतना ही?नहीं इससे कहीं ज्यादा इतना ज्यादा की उसे तो खबर भी नहीं होगी की उसके आने से मेरे जीवन में क्या असर पड़ा है। उस पर किस हद तक निर्भर करने लगी हूँ मैं। और ये निर्भरता सिर्फ काम के मामले में ही नहीं है और भी ऐसी कई बातें हैं जो शब्दों से परे हैं। जैसे की निर्जनता में मात्र १ और व्यक्ति के होने की अनुभूति कैसी होती होगी शायद आप अनुमान लगा सकें।
सोमा-मात्र १७ साल की बर्मा से आई हुई एक किशोरी है.बर्मा से बैंकॉक का सफ़र कितनी मुश्किलों से भरा होता है ये मैंने कई लोगों से सुना है और पढ़ा भी हैये लोग अवैध रूप से दाखिल होते है यहाँ बेहतर जीवन की तलाश में और कई लोग तो रास्ते में मारे भी जाते हैं.१५ दिन के इस सफ़र में न खाने की कोई व्यवस्था न पीने की यहाँ तक की प्राकृतिक ज़रूरतों को भी पूरा करने की कोई व्यवस्था नहीं.एक दुसरे के ऊपर लादे फंदे,ऐसी अमानवीय स्थितियों में ये लोग यहाँ तक आते हैं। शिक्षा के अभाव में ज़्यादातर लड़कियां यहाँ के घरों में मेड का काम करती हैं और लड़के दुकानों पर.बेहतर जीवन का सपने पाले यहाँ तक आने वालों को बेहतर जीवन मिल पाटाहै या नहीं ये तो नहीं पता पर हाँ इनमे से किसी के माथे पर कभी कोई शिकन मैंने नहीं देखी.देखा है तो हमेशा हंसते ही,मुस्कराते ही और काम करते ही। हाँ, उदासी तो कभी कभी सबके जीवन में आती है और इनको भी अकेलापन लगता ही होगा क्योंकि ये लोग तो वापस भी नहीं जा सकते। एक बार यहाँ आ गए तो मान लो की जीवन भर यहीं रहना है क्योंकि इतनी तकलीफों से एक बार फिर गुजरने के माद्दा किसी में नहीं होता और न ही इच्छा और फिर पकडे जाने का दर भी।तो ये लोग यहीं के हो जाते हैं और कमा कमा कर वहां बर्मा भेजते रहते हैं अपने परिवार का पेट पालने के लिए.इनमे से कोई अपने नवजात शिशु को छोड़कर आया होता है तो कोई अपने पति को तो कोई अपने बीमार माता पिता को.पर पेट की आग जो न कराये वो कम है.खैर....
सोमा को बैंकॉक आये १ साल हो गया .बेहद शर्मीली सी,कम बोलने वाली प्यारी सी लड़की है सोमा.दुनिया की चमक दमक से अभी तक दूर है.सुन्दरता के जो भी मापदंड है उन पर वो खरी उतरती है.कालिदास की नायिकाओं सी सुन्दर है वो। बड़ी बड़ी आँखें,तीखी नासिका,गुलाबी पतले अधर और एकदम दुघ्द के सामान धवल त्वचा.सौंदर्य प्रतियोगिता की विजेता भी शरमाँ जायें उसके सामने.और अभी तक भोलापन भी बरकरार है.एकदम नन्हे शिशु सी भोली है वो.इतनी मासूम की कभी कोई गलती कर भी देती है तो मै उसे दांत ही नहीं पाती.कोई गलती होने पर उसकी बड़ी बड़ी निश्छल आँखों में ऐसा दर समां जाता है की भयभीत सहमी हुई हिरनी की याद आ जाती है.उसकी वो मधुर भाव भंगिमा देखते ही बनती है और मै हंस कर कह देती हूँ 'कोई बात नहीं'.और फिर एक मधुर सी मुस्कान उसके अधरों पे तैर जाती है.उसको तो खैर पता ही नहीं अपनी इन खूबियों के बारे में। पता होता तो शायद इतना प्राकृतिक कुछ भी नहीं रह जाता एक बनावटीपन झलकने लगता है।
वो होती है तो बर्तनों ki khat khat,पानी गिरने की आवाज़,कपडे फटकारने की आवाज़....ऐसी ही नाना प्रकार की आवाजों से मेरा घर गुंजायमान रहता है और किसी के होने की अनुभूति मुझे प्रसन्न रखती है.और जब वो चली जाती है तब फिर से स्तब्ध कर देने वाली शांति छा जाती है जिसमे बस कभी कभी कुछ मशीनों की आवाज़ गूंजती है उस नीरव सन्नाटे को भग्न करती हुई........